शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

याद सयानी है।




इस वक्त की भी अजब कहानी है।
वो न आए तो पहाड़ जो आ जाए तो बहता पानी है।

खोलो अपने पंखों को और छू लो ये आसमां
कौन जाने कल क्या होगा बस दो-चार दिन की ये जवानी है।

मोहब्बत में गुजार दो जिंदगी किसी हसीन दरखत के तले
क्या फिक्र की कौन गुजर गया ये कांरवा तो हमेच्चा आनी-जानी है।

कह दो चांद से भी की अपनी हद में रहे
उसको भी मालूम हो कि इक दीवना ऐसा भी है जो करता अपनी मनमानी है।

बहुत सुना दी है कहानियां चांद और परीयों के देच्च में जाने की
कुछ हकीकत भी सुनाओं की कोई मुल्क ए मोहब्बत ऐसा भी है जहां न राजा न कोई रानी है।

कभी मेरे आंखों से निकाल दे पानी के सैलाब
और कभी होठों पर तब्बसुम
इस याद का क्या करें ये भी मेरे माच्चूक की तरह बहुत सयानी है।

1 टिप्पणी:

  1. जो रुबाई रहे,वे रहे और के..जो गजल हो गए वे हमारे बने।
    दर्द जब पास था,हम शहंशाह थे,दर्द जब से गया बेसहारे बने।

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